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तुम्हारे साथ, एक चाय मिट्टी के कुल्हड़ में

  सुनो....... तुम्हारे साथ ठंडे से, भीगे मौसम में, मिट्टी केकुल्हड़ में गरम सी चाय पीनी है। हाथों से कुल्हड़ को पकड़े हुए, चाय की चुस्कियों के बीच बीच में, देखना है तुम्हे जी भरके और घूँट घूँट चाय की तरह रखना है तुम्हें उस हर एक पल,नजरों में बसाके जिस तरह  चाय की हर घूँट में आंखे बंद हो जाती है, आनन्द और शांति से उसी तरह साथ तुम्हारे, मिट्टी के कुल्हड़ को हाथों में थामे हुए महसूस करूंगी मैं वही शांति, आनन्द और प्रेम को।। ठंडे से मौसम में, भाँप उड़ाती चाय को काँपती सी उंगलियों से पकड़ कर, तुमसे करनी हैं दुनिया जहान की बातें कुछ अपनी, कुछ तुम्हारी, कुछ हमारी और कुछ तकलीफों, परेशानियों की बातें। जिस तरह उड़ जाती है भाँप, मिट्टी के कुल्हड़ की चाय से उसी तरह शायद मिट जाएंगी तकलीफें, परेशानियां, जिम्मेदारियां और बेचैनियाँ इस दिल, दिमाग और इस मिट्टी से बने शरीर से जब मिट्टी का कुल्हड़ रिक्त हो जाएगा चाय से कुछ निशान तो फिर भी रहेंगे ना चाय के, उसकी मिठास के,  उसकी सुगन्ध के, फिर मैं उठ जाऊंगी, तुम भी उठ जाओगे चलेंगे फिर से अपने गंतव्य को, बढेंगे फिर से अपने...