संदेश

विश्वास

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 ★मृत्यु का भय? नही है. ★स्वयं से प्रेम? अथाह. ★ये विरोधाभाष नही? नही. ★क्यो? मृत्यु मेरी नही, शरीर की और यदि मृत्यु हुई तो प्रभु इच्छा से नया जन्म या मोक्ष  ★और स्वयं से प्रेम? प्रभु से प्रेम, प्रभु की प्रत्येक रचना से प्रेम, मैं स्वयं प्रभु रचित, तो स्वयं से प्रेम क्यो न हो ★पुनः नव जीवन?? प्रभु रचित संसार मे मेरे कर्म, कर्म बंधन, कर्तव्य अपूर्ण उन्हें पूर्ण करने का एक ओर अवसर ★मोक्ष?  सीधे प्रभु मिलन, ब्रह्मांड में विलीन और घुलित ★पुनः जीवन मे दुःख? शायद मैं अधिक प्रिय प्रभु को, वो चाहते मैं उन्हें कभी भी, किसी भी परिस्थिति में न बिसराऊ  ★प्रभु पर विश्वास का कारण? क्योकि वो हैं.  सदा से, सृष्टि से पहले से भी, बाद भी, जब कुछ नही था तब भी, जब बहुत कुछ है तब भी, विज्ञान में भी और ज्ञान में भी, अणु में भी, परमाणु में भी शून्य में भी, अनन्त में भी🙏🙏🙏 (विचार चलते रहते मन मे, बस यूँही उतार लिए शब्दों में)  रेनू'अम्बिका'

ईश्वरीय कृपा

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 सुबह की उजली लालिमा ली हुई सूर्य की किरणें, जब बिखरती है विशाल नीले आसमानी से पटल में, जब चहचहाती हैं चिड़ियां मीठी सी आवाज में, जब मंद मंद सी बयार बहती है छूकर पेड़ो की पत्तियों को, जब सूरज और चंदा होते हैं कुछ देर को एक साथ,आसमान में एक दूसरे के आमने सामने  और जब रात मुस्करा कर लेती है विदा और करती है स्वागत सवेरे का,  सुबह का हर एक वो पल मुझे यकीन दिलाता है ईश्वर की असीम शक्ति, कृपा और प्रेम का........ जो अनवरत है लगातार है...... अम्बिका 'रेनू'

तुम्हारा अधिकार

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  सुनो कभी अपना अधिकार भी मान लेना मुझ पर जब मैं कहूँ की तुम मुझ में ही बसते हो कहीं. ये अधिकार जिसे तुम्हे दिया है मैंने स्वयं, अपने आप के उस हिस्से से जो है केवल मेरा ये वो हिस्सा है मेरा, जो दबा नही है किसी भी सामाजिक रीति ओर रिवाजों, कर्तव्यों, फर्जों की चारदीवारी तले. मेरा नितांत स्वतंत्र हिस्सा जहाँ मैं मुक्त हूँ. जहाँ मुझे समाज की, धर्म की, संस्कारों की कोई भी बेड़िया जकड़ नही सकतीं। तुम्हें क्यों सौंप दूँ वो हिस्सा जो बंटा हुआ है, कई हिस्सों में, कुछ कुछ, थोड़ा थोड़ा सबकेलिए तुम्हारे लिए है, केवल वह हिस्सा जो बस मेरा है। मैं होती हूँ भिन्न भिन्न समाज मे भिन्न भिन्न रूपों में हँसती, मुस्कराती, गाती, गुनगुनाती, खिलखिलाती और भी सारे, कई अन्य भावों का साथ कभी इच्छा से कभी अनिच्छा से पर.... तुम्हारे प्रेम में मैं होती हूँ बस स्वयं सी खुद में मगन, प्रसन्न सी, थोड़ी कसक व बैचैन सी. केवल ओर केवल स्वयं की इच्छा से तो तुम भी मानना मुझ पर, स्वयं का अधिकार प्रेम का अधिकार.... संपूर्णता का अधिकार... अम्बिका 'रेनू'

साथ चाहिए तुम्हारा

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 कान्हा साथ चाहिए मुझे, तुम्हारा जब मैं दिल,दिमाग से लड़ते लड़ते थक जाऊँ, तब तुम पास आ जाओ मेरे कंधे पर सिर रखकर कुछ पल सुकून और शान्ति मिल जाये मुझे। अपने भीतर के शोर को कम करने के लिए जाल सा जो बुन लिया है मैंने कभी कभी दरक जाते हैं  उसके भी कुछ फंदे, जहाँ से झाँकने लगती है पीड़ा अथाह सी कुछ बूंद बूंद सी गिरती है ह्रदय पर किन किन भावों और भावनाओं की दर्द ? मोह? प्रेम? क्रोध? बिछोह? बेबसी या लाचारी पता नही पर सूखे ही रहते हैं नयन  बस मन भीग भीग सा जाता है तब कान्हा साथ चाहिए होता है तुम्हारा तुम ही कहो,  कुछ मार्ग भी रखे हैं तुम तक पहुचने के अपनी पीड़ा और प्रेम तुम तक पहुचाने के या प्रेम करने के बाद भी.... तुम तक नही पहुचेंगे मन के उद्गार कोई अम्बिका 'रेनू'

प्रभ भरोसे

  कुछ भी नही प्रभु मैं, बस आपके चरणों की धूल हूँ मैं संवर रही हूँ, निखर रही हूँ जब से शरण मे आई हूँ अब चिंता कुछ है नही मुझे, तुम हो न सब देखने को संभालने को, रास्ता दिखाने को, नैय्या पार लगाने को तो क्यो चिंता करूँ मैं व्यर्थ में ही क्यों मन को भरमाऊं मैं जो भी है तुम देख रहे हो चित्त को काहे अधीर करूँ मैं

तुम्हारे साथ, एक चाय मिट्टी के कुल्हड़ में

  सुनो....... तुम्हारे साथ ठंडे से, भीगे मौसम में, मिट्टी केकुल्हड़ में गरम सी चाय पीनी है। हाथों से कुल्हड़ को पकड़े हुए, चाय की चुस्कियों के बीच बीच में, देखना है तुम्हे जी भरके और घूँट घूँट चाय की तरह रखना है तुम्हें उस हर एक पल,नजरों में बसाके जिस तरह  चाय की हर घूँट में आंखे बंद हो जाती है, आनन्द और शांति से उसी तरह साथ तुम्हारे, मिट्टी के कुल्हड़ को हाथों में थामे हुए महसूस करूंगी मैं वही शांति, आनन्द और प्रेम को।। ठंडे से मौसम में, भाँप उड़ाती चाय को काँपती सी उंगलियों से पकड़ कर, तुमसे करनी हैं दुनिया जहान की बातें कुछ अपनी, कुछ तुम्हारी, कुछ हमारी और कुछ तकलीफों, परेशानियों की बातें। जिस तरह उड़ जाती है भाँप, मिट्टी के कुल्हड़ की चाय से उसी तरह शायद मिट जाएंगी तकलीफें, परेशानियां, जिम्मेदारियां और बेचैनियाँ इस दिल, दिमाग और इस मिट्टी से बने शरीर से जब मिट्टी का कुल्हड़ रिक्त हो जाएगा चाय से कुछ निशान तो फिर भी रहेंगे ना चाय के, उसकी मिठास के,  उसकी सुगन्ध के, फिर मैं उठ जाऊंगी, तुम भी उठ जाओगे चलेंगे फिर से अपने गंतव्य को, बढेंगे फिर से अपने...

कभी स्त्री कभी पुरुष

  कईबार सुना था मैंने मर्द सी स्त्री या पुरुष स्त्री सा, बहुत समय पश्चात,समंझ आया एक ही मनुष्य में छुपे होते हैं प्रकृति के दोनों रूप...... पुरुष भी स्त्री भी बस जिसको मिली जैसी परिस्थिति वही अपना रूप दिखा गया स्त्री को बन जाना पड़ा कई बार पुरुष और कभी परिस्थितियों ने बना दिया पुरुष को स्त्री दोनों ही रूपों में दोनों पूर्ण रहे चाहे सुकोमल सा पुरुष या भीम सी बलवान स्त्री कभी मजबूत और उदंड बन जाना पड़ा स्त्री को कभी दया और प्रेम का सागर उमड़ आया पुरुष में। कुछ तो अज्ञानी थी मैं अर्धनरनारीश्वर का मतलब जानने में समय लगा वही समझा जो बताया गया स्वयं समझने की कोशिश नही की क्योकि बरसों से बस लकीर के फकीर रहे हैं हम बस जब लकीर के साथ चलना छोड़ा  बहुत कुछ छुपा हुआ जो था, अज्ञात वो सामने आ गया बनकर ज्ञात एक ही रूप शिव और शक्ति पूरक एक दूसरे के हैं, समाहित एक दूसरे में अब जानती हूं ......... एक ही इंसान में होते हैं दोनों, कभी स्त्री कभी पुरुष