हैलो दोस्तों आज मैं फिर आपके सामने हाज़िर हूँ” मेरा बचपन मेरा दादू पार्ट-3 “लेकर. जैसा कि आपको पिछले भाग में मैंने बताया था की अब हमारी तिकड़ी हो गई थी मेरा छोटा भाई मनु भी अब हमारे ग्रुप में आ गया था तो शैतानी थोड़ी सी बढ़ गई थी, वेसे ये थोड़ी सी, मुझे या मेरे दोनों भाइयो को ही लगती थी मम्मी पापा को तो हम मासूम हमेशा शैतान और दुष्ट ही लगते थे जिसमे बिलकुल भी सच्चाई नही थी. हाँ तो मैं बता रही थी की तिकड़ी बन गई थी अपनी.और तिकड़ी के मेम्बेर्स थे बिन पैंदे के लौटे, कभी मैं दादू की साइड तो कभी दादू मनु की साइड तो कभी मनु से ही या दादू से ही आपस में पंगा. आपस में ही कभी दे दना दन तो कभी प्यार. सच्ची बहुत प्यारे दिन थे वो जब रुठते भी खुद ही थे और मानते भी खुद ही थे. एक दुसरे से लड़ना , पीटना, मानना, मुस्कराना और रात को सबका एक साथ बैठकर कहानी सुनना. कहानी का किस्सा भी मजेदार था. रोज रात को मनु और मैं दादू के सामने बैठ जाते और वो कहानी सुनाता – एक था भगवा लाटा,,,,,,, अब ये भगवा लाटा एक ही दिन नही होता था बल्कि रोज होता था. रोज हमको यही कहानी सुनाता और फ...
सुनो....... तुम्हारे साथ ठंडे से, भीगे मौसम में, मिट्टी केकुल्हड़ में गरम सी चाय पीनी है। हाथों से कुल्हड़ को पकड़े हुए, चाय की चुस्कियों के बीच बीच में, देखना है तुम्हे जी भरके और घूँट घूँट चाय की तरह रखना है तुम्हें उस हर एक पल,नजरों में बसाके जिस तरह चाय की हर घूँट में आंखे बंद हो जाती है, आनन्द और शांति से उसी तरह साथ तुम्हारे, मिट्टी के कुल्हड़ को हाथों में थामे हुए महसूस करूंगी मैं वही शांति, आनन्द और प्रेम को।। ठंडे से मौसम में, भाँप उड़ाती चाय को काँपती सी उंगलियों से पकड़ कर, तुमसे करनी हैं दुनिया जहान की बातें कुछ अपनी, कुछ तुम्हारी, कुछ हमारी और कुछ तकलीफों, परेशानियों की बातें। जिस तरह उड़ जाती है भाँप, मिट्टी के कुल्हड़ की चाय से उसी तरह शायद मिट जाएंगी तकलीफें, परेशानियां, जिम्मेदारियां और बेचैनियाँ इस दिल, दिमाग और इस मिट्टी से बने शरीर से जब मिट्टी का कुल्हड़ रिक्त हो जाएगा चाय से कुछ निशान तो फिर भी रहेंगे ना चाय के, उसकी मिठास के, उसकी सुगन्ध के, फिर मैं उठ जाऊंगी, तुम भी उठ जाओगे चलेंगे फिर से अपने गंतव्य को, बढेंगे फिर से अपने...
सुनो कभी अपना अधिकार भी मान लेना मुझ पर जब मैं कहूँ की तुम मुझ में ही बसते हो कहीं. ये अधिकार जिसे तुम्हे दिया है मैंने स्वयं, अपने आप के उस हिस्से से जो है केवल मेरा ये वो हिस्सा है मेरा, जो दबा नही है किसी भी सामाजिक रीति ओर रिवाजों, कर्तव्यों, फर्जों की चारदीवारी तले. मेरा नितांत स्वतंत्र हिस्सा जहाँ मैं मुक्त हूँ. जहाँ मुझे समाज की, धर्म की, संस्कारों की कोई भी बेड़िया जकड़ नही सकतीं। तुम्हें क्यों सौंप दूँ वो हिस्सा जो बंटा हुआ है, कई हिस्सों में, कुछ कुछ, थोड़ा थोड़ा सबकेलिए तुम्हारे लिए है, केवल वह हिस्सा जो बस मेरा है। मैं होती हूँ भिन्न भिन्न समाज मे भिन्न भिन्न रूपों में हँसती, मुस्कराती, गाती, गुनगुनाती, खिलखिलाती और भी सारे, कई अन्य भावों का साथ कभी इच्छा से कभी अनिच्छा से पर.... तुम्हारे प्रेम में मैं होती हूँ बस स्वयं सी खुद में मगन, प्रसन्न सी, थोड़ी कसक व बैचैन सी. केवल ओर केवल स्वयं की इच्छा से तो तुम भी मानना मुझ पर, स्वयं का अधिकार प्रेम का अधिकार.... संपूर्णता का अधिकार... अम्बिका 'रेनू'
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