सुनो कभी अपना अधिकार भी मान लेना मुझ पर जब मैं कहूँ की तुम मुझ में ही बसते हो कहीं. ये अधिकार जिसे तुम्हे दिया है मैंने स्वयं, अपने आप के उस हिस्से से जो है केवल मेरा ये वो हिस्सा है मेरा, जो दबा नही है किसी भी सामाजिक रीति ओर रिवाजों, कर्तव्यों, फर्जों की चारदीवारी तले. मेरा नितांत स्वतंत्र हिस्सा जहाँ मैं मुक्त हूँ. जहाँ मुझे समाज की, धर्म की, संस्कारों की कोई भी बेड़िया जकड़ नही सकतीं। तुम्हें क्यों सौंप दूँ वो हिस्सा जो बंटा हुआ है, कई हिस्सों में, कुछ कुछ, थोड़ा थोड़ा सबकेलिए तुम्हारे लिए है, केवल वह हिस्सा जो बस मेरा है। मैं होती हूँ भिन्न भिन्न समाज मे भिन्न भिन्न रूपों में हँसती, मुस्कराती, गाती, गुनगुनाती, खिलखिलाती और भी सारे, कई अन्य भावों का साथ कभी इच्छा से कभी अनिच्छा से पर.... तुम्हारे प्रेम में मैं होती हूँ बस स्वयं सी खुद में मगन, प्रसन्न सी, थोड़ी कसक व बैचैन सी. केवल ओर केवल स्वयं की इच्छा से तो तुम भी मानना मुझ पर, स्वयं का अधिकार प्रेम का अधिकार.... संपूर्णता का अधिकार... अम्बिका 'रेनू'
कान्हा साथ चाहिए मुझे, तुम्हारा जब मैं दिल,दिमाग से लड़ते लड़ते थक जाऊँ, तब तुम पास आ जाओ मेरे कंधे पर सिर रखकर कुछ पल सुकून और शान्ति मिल जाये मुझे। अपने भीतर के शोर को कम करने के लिए जाल सा जो बुन लिया है मैंने कभी कभी दरक जाते हैं उसके भी कुछ फंदे, जहाँ से झाँकने लगती है पीड़ा अथाह सी कुछ बूंद बूंद सी गिरती है ह्रदय पर किन किन भावों और भावनाओं की दर्द ? मोह? प्रेम? क्रोध? बिछोह? बेबसी या लाचारी पता नही पर सूखे ही रहते हैं नयन बस मन भीग भीग सा जाता है तब कान्हा साथ चाहिए होता है तुम्हारा तुम ही कहो, कुछ मार्ग भी रखे हैं तुम तक पहुचने के अपनी पीड़ा और प्रेम तुम तक पहुचाने के या प्रेम करने के बाद भी.... तुम तक नही पहुचेंगे मन के उद्गार कोई अम्बिका 'रेनू'
भिटोली- मायके का आशीष आज भिटोली आई हैं मेरी. उत्तराखंड में एक रिवाज़ हैं जिसमे चैत्र महीने में प्रत्येक परिवार अपनी शादीशुदा बेटी को पकवान, मिठाई, नए कपडे, रुपये आदि देते हैं जिसे भिटोली कहा जाता हैं. जिनकी नयी नयी शादी हुई होती हैं उनकी पहली भिटोली चैत्र से पहले महीने फाल्गुन में ही दे दी जाती हैं. प्रत्येक शादीशुदा बेटी अपने माता-पिता या भाई बहन का इंतज़ार करती हैं कि कब उसके मायके वाले उससे मिलेंगें. इस महीने का उत्साह उनमे देखते ही बनता हैं ये जानने की उत्सुकता थी की आखिर भिटोली क्यों मनाया जाने लगा इसके पीछे क्या कारण था या इसके बारे में कोई प्रचलित कहानी थी तो इस बारे में पता किया तब मेरे सामने एक कहानी आई. कहानी मेरे मामाजी ने मुझे बताई थी जब वो अपनी बहन को भिटोली देने आये थे. कहानी उनके अनुसार कुछ ऐसी थी- पुराने समय में गोपीचंद नाम के एक राजा हुए. कई वर्ष राज करने के बाद वो सांसारिक जीवन से ऊब गये और उन्होंने संन्यास ले लिया. संन्यास लेने के बाद वो जगह जगह भिक्षा मांगकर अपना जीवन यापन करने लगे. कहा जाता हैं की जो संन्यास...
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