तुम्हारा अधिकार

 

सुनो कभी अपना अधिकार भी मान लेना मुझ पर
जब मैं कहूँ की तुम मुझ में ही बसते हो कहीं.
ये अधिकार जिसे तुम्हे दिया है मैंने स्वयं,
अपने आप के उस हिस्से से जो है केवल मेरा
ये वो हिस्सा है मेरा, जो दबा नही है किसी भी
सामाजिक रीति ओर रिवाजों,
कर्तव्यों, फर्जों की चारदीवारी तले.

मेरा नितांत स्वतंत्र हिस्सा जहाँ मैं मुक्त हूँ.


जहाँ मुझे समाज की, धर्म की, संस्कारों की
कोई भी बेड़िया जकड़ नही सकतीं।
तुम्हें क्यों सौंप दूँ वो हिस्सा जो बंटा हुआ है,
कई हिस्सों में, कुछ कुछ, थोड़ा थोड़ा सबकेलिए
तुम्हारे लिए है, केवल वह हिस्सा जो बस मेरा है।


मैं होती हूँ भिन्न भिन्न समाज मे भिन्न भिन्न रूपों में
हँसती, मुस्कराती, गाती, गुनगुनाती, खिलखिलाती

और भी सारे, कई अन्य भावों का साथ

कभी इच्छा से कभी अनिच्छा से


पर.... तुम्हारे प्रेम में मैं होती हूँ बस स्वयं सी
खुद में मगन, प्रसन्न सी, थोड़ी कसक व बैचैन सी.
केवल ओर केवल स्वयं की इच्छा से
तो तुम भी मानना मुझ पर, स्वयं का अधिकार
प्रेम का अधिकार....
संपूर्णता का अधिकार...




अम्बिका 'रेनू'

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