पुराने दिन और रिश्ते💜💜


एक समय था जब लोग बहुत देर तक परिवार के साथ, मित्रों के साथ बैठते थे, बातें करते थे पर आज के समय मे लोगों के बीच संवाद/बातचीत या कंवर्सेशन बिल्कुल ही कम होती जा रही है। चलो कोई अकेले हैं तो फोन में व्यस्त होना समझ आता है पर परिस्थिति तब और भी गलत लगती है जब कोई साथ है या पूरे परिवार के बीच मे भी अगर कोई अपने फोन में ही व्यस्त है। सब साथ हों और सब ही अपने अपने फोन में बिजी हो तब बड़ी अजीब स्थिति हो जाती  है। कहाँ के सुख कहाँ के दुःख। पहले से शाम के चाय पानी के वक्त या रात के खाने के समय व बाद में सब साथ बैठते थे बातें होती थीं, एक दूसरे की परेशानियों को समझते थे, खुशियां बांटते थे पर अब इन सब को मन तरस जाता है।

अपने सुख दुख बांटकर मन भी हल्का व खुश हो जाता था, लोग किस्से कहानियां, अपने अनुभव शेयर करते थे। शायद तभी इतना अकेलापन नही था और आज सब  डिजिटल भीड़ में तो हैं पर उनमें से कितने एक्चुअल प्रॉब्लम में आपके साथ, आपके पास होंगे कोई नही जानता।  आज हमारे पास फ्रेंड्स की लिस्ट मिलियन्स तक होती है पर जब आप कठिनाई में होंगे तो सामने कोई नही। जबकि पहले लोग आपको सुनते थे, लोग आपस मे अच्छे बुरे पल शेयर करते थे। बचपन मे भी हम सब कितनी देर तक रात को सभी भाई बहन गप्पे मारते थे, मम्मी पापा भी हमारे साथ बैठकर सही गलत बताते थे, बड़े सयाने घर आते तो उनके साथ बैठकर उनके किस्से सुनते थे। उन किस्सों से ही कितनी काम की चीजें पता चल जाती थीं।

पहले रिश्तों में एक दूसरे को सुना जाता था, संवाद होता था, प्रश्न होते थे उत्तर होते थे तभी लोग मेंटली भी बहुत स्ट्रांग होते थे क्योकि एक दूसरे का सहारा होता था। आज तो मन की बात भी मन मे ही रह जाती है, आदमी  हँसता रहेगा पर मन के भीतर के मंथन को संभाल नही पाता तभी तो आज इतनी आत्महत्या भी देखने को मिलती हैं। हाँ पहले भी होती थीं पर कम होती थी. तब परिवार, मित्र समाज एक दूसरे से अधिक और धरातल पर जुड़े थे, हवाई रिश्ते नही थे। आज कोई सुनने वाला नही। एक ही परिवार में भी सबके हाथ मे मोबाइल और सब व्यस्त. वैसे हर परिवार में एक we time जरूर होना चाहिए जब सब मोबाइल अलग रखकर आधा एक घन्टा साथ बिताएं बात करें एक दूसरे को सुने, समझे, ताकि कनेक्शन टूटे नही और सच बताऊँ तब आप मेंटली अधिक स्ट्रांग होंगे।

कई बार या हर बार सामने वाले को सुनना, उनके प्रश्नों का उत्तर देना बहुत जरूरी होता है क्योंकि एक बार कोई चले गया तो वापस नही आता। वैसे आपने श्री कृष्ण जी का ये प्रसंग तो सुना ही होगा ना जिसमे वो बताते हैं कि बातचीत, प्रश्न उत्तर क्यो जरूरी है। चलिए आपको बताती हूँ ये प्रसंग--

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 एक बार श्री कृष्ण जी की पटरानी रुक्मिणी जी ने  कृष्ण जी से कहा- नाथ, एक बात कहूँ.....आप बुरा तो न मानेंगे?

कृष्ण जी ने कहा- कहिए देवी, अपनी पति के कुछ भी पूछने से भला क्यों और कैसी नाराजगी? आप पूछिये जो भी आपको पूछना है।

रूक्मिणी- मैंने सुना है कि राधा जी आपसे बहुत सारे प्रश्न पूछा करतीं थीं और आप उनके सभी प्रश्नों का उत्तर दिया करते थे, बिना किसी झुंझलाहट या परेशानी के।

कृष्ण जी थोड़ा मुस्कुराए और बोले- हाँ देवी आपने बिल्कुल सही सुना है।

रुक्मिणी - फिर स्वामी आपको कोई परेशानी नही होती थी या आपको क्रोध नही आता था, जब आपसे कोई बार बार प्रश्न करे, और आप उत्तर देते रहें ?

कृष्ण- देवी, यदि तुम अपने प्रियजनों के प्रश्नों से ऊब जाओ, झुंझला जाओ तो समंझ लो कि उस रिश्ते में तुम्हारा योगदान केवल उसे ढोने भर का रह गया है।

रुक्मिणी- इसका तात्पर्य है कि सामने वाले को सुनना और उनके सभी प्रश्नों का उत्तर देना आवश्यक है?

कृष्ण- हां देवी, और केवल उत्तर देना ही नही बल्कि उचित उत्तर देना भी इतना ही आवश्यक है, प्रत्येक सम्बंध की यही तो नींव है।

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तो समझे आप? हर रिश्ते की नींव है बातचीत या प्रश्नुत्तर. भले ही रिश्ता माँ बाप, भाई बहन, पति पति या मित्रों के बीच हो 


बस ऐसे ही बैठे बैठे ये सोच आ रहे थे तो  सोचा आपसे शेयर करूँ, वैसे हमारी व हमसे पहले वाली पीढ़ी बहुत खुशकिस्मत है कि हमने गप्पों वाला दौर देखा है। क्या कहते हो आप लोग???

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