प्रेम -समय के साथ बदलते रूप
प्रथम भाग
प्रेम जिसमे टिका संसार सारा, जो आधार इस सृष्टि का ।
आपका प्रेम, आपको किस दिशा में ले जा रहा है इसका मनन करना बहुत जरूरी है। As a human आप उन्नति कर रहे हो या अवनति ये जानना जरूरी है। अगर किसी के आपके लाइफ में आने से आप positive person बन रहे हो, आपकी आध्यात्मिक उन्नति हो रही है, आप अपने फर्ज व कर्तब्यों को समंझ रहे हो, सामाजिक व आर्थिक रूप से आगे बढ़ रहे हो, जो आपको सही और गलत की समंझ दे रहा हो, जो आपको आपके अच्छे और विकास के लिए प्रेरित कर रहा हो वही व्यक्ति आपके लायक है नही तो नही। और जो ऐसा न हो, ऐसे से कैसे प्यार, क्यो प्यार. ऐसे इंसान से दूर रहना ही भला है।
केवल शारीरिक आकर्षण के आधार पर जो प्रेम होता है वह ज्यादा समय रहता नही, आपका आकर्षण खत्म, रिश्ता खत्म. क्या लाभ ऐसे सम्बन्धो का?? जहाँ आधार प्रेम नही केवल बाहरी सौंदर्य, जरूरत, या लाभ हानि है। और जहाँ आप किसी के धन, स्टेटस को देख कर प्यार करें उसकी लाइफ क्या होगी आप समंझ सकते हो।
तो प्रेम करें तो बहुत सोच समझ कर.
पहले के समय के बारे में जब भी अपने बड़े बुजुर्गों से सुनती थी तो आश्चर्य होता था कि कैसे 3 साल की बच्ची की शादी 5 साल के लड़के से हो जाती थी। मेरी एक मामी खुद 3 साल की थी जब उनकी शादी मेरे 5 साल के मामाजी से हुई थी। मम्मी बताती हैं कि वो फेरे के बाद नानी की गोद में ही सो गईं थीं। कोई अक्ल नही, कोई समंझ नही.
फिर भी आज जब उनको देखती हूँ तो लगता है कि कितना खूबसूरत है उन दोनों का रिश्ता। बहुत कमजोर और बुड्ढे हो गए हैं दोनों पर फिर भी एक दूसरे का बहुत ध्यान रखते हैं। ऐसा व्यवहार तो आजकल की लव मैरिज वालों का भी नही देखती मैं, जितना उनका एक दूसरे के लिए आज तक समर्पण भाव है।
तब के समय मे तो पति को कई कई दिन तक देख भी नही पाते थे एक ही घर मे रहते हुए भी, सबके सामने बात करना भी मुश्किल था, बहुत बार तो बचपन मे शादी हो गई तो लड़के पढ़ने चले जाते या बाद में नोकरी पर, तब भी महिलाएं और पुरुष पूरे समर्पित रहते थे एक दूसरे के प्रति, बहुत बार प्रेम न होने पर भी संबंध निभाये जाते थे, बल्कि अधिकतर विवाह जो होते थे उनका आधार कभी भी प्रेम होता ही नही था। माता पिता ने जिसे चुन लिया पूरी निष्ठा से उसी के साथ निबाह किया जाता था, भले ही कितना ही किसी से प्रेम क्यो न हो,(हालाँकि जिस छोटी उम्र में ही विवाह हो जाते थे उसमे पहले ही किसी से प्रेम होना सम्भव भी न था) उस प्रेम को मन मे संजो कर पति और पत्नी अपने अपने दायित्व पूरे करते थे, समय के साथ साथ उनके रिश्तों में एक दूसरे के लिए प्रेम भी होता था और विश्वास व समर्पण भी. माता पिता द्वारा लिए गए निर्णय पर विश्वास कर अपनी जीवन नैया पार लगाते और सफल भी होते, आज भी कई ऐसे लोगों की किस्से कहानियां सुनने को मिल जाती हैं, जो कहते हैं कि हमने तो शादी के 5 साल बाद, 10 साल बाद अपने उनको देखा था।
कितना अजीब लगता हैं ना सुनकर कि विवाह के इतने समय तक भी 2 लोगो के बीच कोई जान पहचान ही न थी। आज तो बिना देखे जाने शादी छोड़ो डेट भी न हो।
किस्से कई हैं प्रेम के, रूप कई
पर समय की विवशता
मिलते हैं जल्दी ही
अम्बिका रेनू
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें