प्रेम-भाव एक रूप अनेक
कोमल मन के भाव सभी प्रेम ही तो हैं
प्रेम जो होता है अनेक से, बस रूप बदल जाते हैं।
कभी प्रेम लगा लेता है चेहरा माँबाप का
कभी भाई बहनों के रूप में बदल जाता है
कभी शक्ल लेकर दोस्तों की, प्रेम जीवन मे बिखर जाता है।
कुछ खिलोने, पेंसिल, रबर, कटर, किताबे, कुछ कपड़े, कुछ पुरानी थैली या सन्दूक जिनमे भरा होता है बचपन का खजाना, बतला देते हैं प्रेम का अलग ही सार।
कभी अपनी कोई गैय्या, कभी कोई काला भूरा सा शेरू, या छोटी सी बिल्ली भी भर देती है जीवन मे प्रेम के कुछ और रूप।
कभी कभी कोई फूलोंसे भरी टहनी, पेड़पौधे सिखा जाते हैं प्रेम की नई परिभाषा केवल देना ही है जिनका आधार।
जीवन मे प्रेम आता है फिर नये रूप में, जब प्रेम होता है किसी खास से, जो बना होता है केवल तुम्हारे लिए, भरकर अनेक रंग जीवन मे प्रेम बिखर बिखर जाता है चारों ओर।
फिर रूप बदल लेता है प्रेम, जब आपके प्यार से साकार होता है एक नया आकार, मिलती है जब प्रेम को एक नई पहचान।
सफर प्रेम का, प्रेम से ही शुरू होता है, प्रेम में ही सिमटता है।
फिर क्यो बीच बीच मे जिंदगी के ये नफरतें चली आती हैं।
फलतेफूलते प्रेम को देख, क्यो नफरत सुलग सी जाती है।
क्यों नफरत प्रेम करना सीख नही लेती।
क्यो नफरत मुस्कराने की खुशी महसूस नही कर लेती।
तब शायद नफरत भी बदल जाती।
फिर वो भी प्रेम में खोकर प्रेम ही बन जाती।
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