प्रेम...
कुछ प्रेम.......
कोई शोर नही
कोई साथ नही
हाथ पकड़ना नही
लेकिन फिर भी...
होते हैं
खामोशी से,
एक दूसरे के भीतर तक
न कोई दिखावा
न कोई दिलासा
न साथ चलने की अभिलाषा
न कोई वादा या वचन
फिर भी............
चल पड़ते हैं कदम खुद ब खुद
साथ निभाने को
जब भी लगता है कि प्रेम को तुम्हारे,
चाहिए होगा साथ तुम्हारा
तुम्हारा प्रेम मौन रहेगा
माँगेगा नही साथ तुमसे
और न कोई निवेदन
बस चाहेंगे कि तुम रहो साथ
और तुम.........
तुम रहोगे साथ, हमेशा हमेशा
आह!!!
कुछ प्रेम..................
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