मैं, मैं न रहूं बस तुम बन जाऊं
प्रेम जो कहते हो
या प्रेम जो बुनते हो
क्या अपने शब्दों में तुमको बतलाऊँ
कौन से भाव, कौन सी प्रेरणा
तुमको मैं सब जतलाऊँ
तो सुनो प्रिय..........
तुम बन जाओ मोरपंख से
मैं मोरपंख के रंग बन जाऊं।
तुम कान्हा की मुरली से
मैं राग और धुन बन जाऊं।।
तुम लो प्रेम में जो जो रूप
मैं हर एक रूप की छाया बन जाऊं।
प्राण बनो तुम जब भी
मैं तुम्हारी काया बन जाऊं।।
प्रेम वशीभूत हो जब भी मुझे पुकारो
मैं कंठ से निकली आवाज बन जाऊं।
जब भी देखो प्रेम से मुझे तुम
नेत्रो में समाई पुतली बन जाऊं।।
आप, आप न रहे मेरा
मैं बस तुम, बस तुम बन जाऊं।
कोई कुछ शेष न रहे मेरा, कुछ मुझमे
मैं तुम्हारी श्वाश, तुम्हारी धड़कन बन जाऊं।।
प्रेम की पवित्रता हो इतनी
मैं ओस की बूंद सी बन जाऊं।
और गहराई हो इतनी प्रेम में
दरिया, ताल, सागर हो जाऊं।।
कविता की 2 पंक्तियां मेरी फैवरेट लेखिका अंकु ट्ह ठाकुर कलम से निकली हैं, पूरी कविता लिखी पर प्रेरणा ओंकी लाइन थी जो मैं भूल ही नही पाई थी। thank you aanku💜
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