कभी स्त्री कभी पुरुष
कईबार सुना था मैंने
मर्द सी स्त्री
या पुरुष स्त्री सा,
बहुत समय पश्चात,समंझ आया
एक ही मनुष्य में छुपे होते हैं
प्रकृति के दोनों रूप......
पुरुष भी स्त्री भी
बस जिसको मिली जैसी परिस्थिति
वही अपना रूप दिखा गया
स्त्री को बन जाना पड़ा कई बार पुरुष
और कभी परिस्थितियों ने बना दिया
पुरुष को स्त्री
दोनों ही रूपों में दोनों पूर्ण रहे
चाहे सुकोमल सा पुरुष
या भीम सी बलवान स्त्री
कभी मजबूत और उदंड बन जाना पड़ा स्त्री को
कभी दया और प्रेम का सागर उमड़ आया पुरुष में।
कुछ तो अज्ञानी थी मैं
अर्धनरनारीश्वर का मतलब जानने में समय लगा
वही समझा जो बताया गया
स्वयं समझने की कोशिश नही की
क्योकि बरसों से बस लकीर के फकीर रहे हैं हम
बस जब लकीर के साथ चलना छोड़ा
बहुत कुछ छुपा हुआ जो था, अज्ञात
वो सामने आ गया बनकर ज्ञात
एक ही रूप शिव और शक्ति
पूरक एक दूसरे के हैं,
समाहित एक दूसरे में
अब जानती हूं .........
एक ही इंसान में होते हैं दोनों,
कभी स्त्री कभी पुरुष
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