साथ चाहिए तुम्हारा

 कान्हा साथ चाहिए मुझे, तुम्हारा

जब मैं दिल,दिमाग से

लड़ते लड़ते थक जाऊँ,

तब तुम पास आ जाओ मेरे


कंधे पर सिर रखकर कुछ पल

सुकून और शान्ति मिल जाये मुझे।

अपने भीतर के शोर को कम करने

के लिए जाल सा जो बुन लिया है मैंने

कभी कभी दरक जाते हैं 

उसके भी कुछ फंदे,

जहाँ से झाँकने लगती है पीड़ा अथाह सी

कुछ बूंद बूंद सी गिरती है ह्रदय पर

किन किन भावों और भावनाओं की

दर्द ? मोह? प्रेम? क्रोध? बिछोह?

बेबसी या लाचारी पता नही

पर सूखे ही रहते हैं नयन

 बस मन भीग भीग सा जाता है

तब कान्हा साथ चाहिए होता है तुम्हारा

तुम ही कहो, 

कुछ मार्ग भी रखे हैं तुम तक पहुचने के

अपनी पीड़ा और प्रेम तुम तक पहुचाने के

या प्रेम करने के बाद भी....

तुम तक नही पहुचेंगे मन के उद्गार कोई



अम्बिका 'रेनू'

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