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ईश्वरीय कृपा

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 सुबह की उजली लालिमा ली हुई सूर्य की किरणें, जब बिखरती है विशाल नीले आसमानी से पटल में, जब चहचहाती हैं चिड़ियां मीठी सी आवाज में, जब मंद मंद सी बयार बहती है छूकर पेड़ो की पत्तियों को, जब सूरज और चंदा होते हैं कुछ देर को एक साथ,आसमान में एक दूसरे के आमने सामने  और जब रात मुस्करा कर लेती है विदा और करती है स्वागत सवेरे का,  सुबह का हर एक वो पल मुझे यकीन दिलाता है ईश्वर की असीम शक्ति, कृपा और प्रेम का........ जो अनवरत है लगातार है...... अम्बिका 'रेनू'

तुम्हारा अधिकार

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  सुनो कभी अपना अधिकार भी मान लेना मुझ पर जब मैं कहूँ की तुम मुझ में ही बसते हो कहीं. ये अधिकार जिसे तुम्हे दिया है मैंने स्वयं, अपने आप के उस हिस्से से जो है केवल मेरा ये वो हिस्सा है मेरा, जो दबा नही है किसी भी सामाजिक रीति ओर रिवाजों, कर्तव्यों, फर्जों की चारदीवारी तले. मेरा नितांत स्वतंत्र हिस्सा जहाँ मैं मुक्त हूँ. जहाँ मुझे समाज की, धर्म की, संस्कारों की कोई भी बेड़िया जकड़ नही सकतीं। तुम्हें क्यों सौंप दूँ वो हिस्सा जो बंटा हुआ है, कई हिस्सों में, कुछ कुछ, थोड़ा थोड़ा सबकेलिए तुम्हारे लिए है, केवल वह हिस्सा जो बस मेरा है। मैं होती हूँ भिन्न भिन्न समाज मे भिन्न भिन्न रूपों में हँसती, मुस्कराती, गाती, गुनगुनाती, खिलखिलाती और भी सारे, कई अन्य भावों का साथ कभी इच्छा से कभी अनिच्छा से पर.... तुम्हारे प्रेम में मैं होती हूँ बस स्वयं सी खुद में मगन, प्रसन्न सी, थोड़ी कसक व बैचैन सी. केवल ओर केवल स्वयं की इच्छा से तो तुम भी मानना मुझ पर, स्वयं का अधिकार प्रेम का अधिकार.... संपूर्णता का अधिकार... अम्बिका 'रेनू'

साथ चाहिए तुम्हारा

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 कान्हा साथ चाहिए मुझे, तुम्हारा जब मैं दिल,दिमाग से लड़ते लड़ते थक जाऊँ, तब तुम पास आ जाओ मेरे कंधे पर सिर रखकर कुछ पल सुकून और शान्ति मिल जाये मुझे। अपने भीतर के शोर को कम करने के लिए जाल सा जो बुन लिया है मैंने कभी कभी दरक जाते हैं  उसके भी कुछ फंदे, जहाँ से झाँकने लगती है पीड़ा अथाह सी कुछ बूंद बूंद सी गिरती है ह्रदय पर किन किन भावों और भावनाओं की दर्द ? मोह? प्रेम? क्रोध? बिछोह? बेबसी या लाचारी पता नही पर सूखे ही रहते हैं नयन  बस मन भीग भीग सा जाता है तब कान्हा साथ चाहिए होता है तुम्हारा तुम ही कहो,  कुछ मार्ग भी रखे हैं तुम तक पहुचने के अपनी पीड़ा और प्रेम तुम तक पहुचाने के या प्रेम करने के बाद भी.... तुम तक नही पहुचेंगे मन के उद्गार कोई अम्बिका 'रेनू'

प्रभ भरोसे

  कुछ भी नही प्रभु मैं, बस आपके चरणों की धूल हूँ मैं संवर रही हूँ, निखर रही हूँ जब से शरण मे आई हूँ अब चिंता कुछ है नही मुझे, तुम हो न सब देखने को संभालने को, रास्ता दिखाने को, नैय्या पार लगाने को तो क्यो चिंता करूँ मैं व्यर्थ में ही क्यों मन को भरमाऊं मैं जो भी है तुम देख रहे हो चित्त को काहे अधीर करूँ मैं