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कभी स्त्री कभी पुरुष

  कईबार सुना था मैंने मर्द सी स्त्री या पुरुष स्त्री सा, बहुत समय पश्चात,समंझ आया एक ही मनुष्य में छुपे होते हैं प्रकृति के दोनों रूप...... पुरुष भी स्त्री भी बस जिसको मिली जैसी परिस्थिति वही अपना रूप दिखा गया स्त्री को बन जाना पड़ा कई बार पुरुष और कभी परिस्थितियों ने बना दिया पुरुष को स्त्री दोनों ही रूपों में दोनों पूर्ण रहे चाहे सुकोमल सा पुरुष या भीम सी बलवान स्त्री कभी मजबूत और उदंड बन जाना पड़ा स्त्री को कभी दया और प्रेम का सागर उमड़ आया पुरुष में। कुछ तो अज्ञानी थी मैं अर्धनरनारीश्वर का मतलब जानने में समय लगा वही समझा जो बताया गया स्वयं समझने की कोशिश नही की क्योकि बरसों से बस लकीर के फकीर रहे हैं हम बस जब लकीर के साथ चलना छोड़ा  बहुत कुछ छुपा हुआ जो था, अज्ञात वो सामने आ गया बनकर ज्ञात एक ही रूप शिव और शक्ति पूरक एक दूसरे के हैं, समाहित एक दूसरे में अब जानती हूं ......... एक ही इंसान में होते हैं दोनों, कभी स्त्री कभी पुरुष

प्रतीक्षा लम्बी होगी तुम्हारी

 प्रतीक्षा लम्बी होगी तुम्हारी तुमने प्रेम चुन लिया ईश्वर को चुना होता तो शायद मिल भी जाते कुछ पहले पर तुमने प्रेम चुन लिया प्रेम, जिसे पाने को, महसूस करने को श्री हरि को भी लेना पड़ा जन्म, करनी पड़ी उन्हें भी प्रतीक्षा आना पड़ा उन्हें द्वापर में फिर से साथ पाने के लिए राधा का। केवल साथ पाने के लिए जब लेना पड़ा जन्म हरि को भी कृष्ण रूप में तुम तो फिर भी मनुष्य हो सोचो कितने जन्म लगेंगे युगों तक की प्रतीक्षा जब कृष्ण की ही रही सोचो, तुम्हारी प्रतीक्षा क्या होगी और केवल श्री हरि ही क्यों प्रेम में विकल और बावरे तो महादेव भी हुए प्रतीक्षा तो उनकी भी लम्बी रही कई युगों की साधना रही कई युगों का ध्यान रहा सती जो गईं वो युगों बाद ही लौटीं सती को जाने में और पार्वती के आने में सोचो कितनी प्रतीक्षा रही अनवरत, लगातार और लगातार तभी तो कहा प्रतीक्षा लम्बी होगी तुम्हारी तुमने प्रेम चुन लिया जहाँ ईश्वर भी आधीन प्रेम के उनके भाग में भी प्रतीक्षा आई तुम तो सूक्ष्म से प्राण रूप तुम्हारी प्रतीक्षा कितनी लम्बी होगी चुन लिया होता यदि ईश्वर को मिल जाते वो तुमको कुछ पह...

मैं, मैं न रहूं बस तुम बन जाऊं

प्रेम जो कहते हो या प्रेम जो बुनते हो क्या अपने शब्दों में तुमको बतलाऊँ कौन से भाव, कौन सी प्रेरणा तुमको मैं सब जतलाऊँ             तो सुनो प्रिय.......... तुम बन जाओ मोरपंख से मैं मोरपंख के रंग बन जाऊं। तुम कान्हा की मुरली से मैं राग और धुन बन जाऊं।। तुम लो प्रेम में जो जो रूप मैं हर एक रूप की छाया बन जाऊं। प्राण बनो तुम जब भी मैं तुम्हारी काया बन जाऊं।। प्रेम वशीभूत हो जब भी मुझे पुकारो मैं कंठ से निकली आवाज बन जाऊं। जब भी देखो प्रेम से मुझे तुम नेत्रो में समाई पुतली बन जाऊं।। आप, आप न रहे मेरा मैं बस तुम, बस तुम बन जाऊं। कोई कुछ शेष न रहे मेरा, कुछ मुझमे मैं तुम्हारी श्वाश, तुम्हारी धड़कन बन जाऊं।। प्रेम की पवित्रता हो इतनी मैं ओस की बूंद सी बन जाऊं। और गहराई हो इतनी प्रेम में दरिया, ताल, सागर हो जाऊं।। कविता की 2 पंक्तियां मेरी फैवरेट लेखिका  अंकु ट्ह ठाकुर कलम से निकली हैं, पूरी कविता लिखी पर प्रेरणा ओंकी लाइन थी जो मैं भूल ही नही पाई थी। thank you aanku💜

प्रेम...

  कुछ प्रेम....... कोई शोर नही कोई साथ नही हाथ पकड़ना नही लेकिन फिर भी... होते हैं खामोशी से, एक दूसरे के भीतर तक न कोई दिखावा न कोई दिलासा न साथ चलने की अभिलाषा न कोई वादा या वचन           फिर भी............ चल पड़ते हैं कदम खुद ब खुद       साथ निभाने को जब भी लगता है कि प्रेम को तुम्हारे,     चाहिए होगा साथ तुम्हारा तुम्हारा प्रेम मौन रहेगा माँगेगा नही साथ तुमसे और न कोई निवेदन बस चाहेंगे कि तुम रहो साथ और तुम.........          तुम रहोगे साथ, हमेशा हमेशा आह!!! कुछ प्रेम..................

कर सकते हो प्रतीक्षा

 कर सकते हो प्रतीक्षा तब तक....... जब तक पूरे कर लूं फर्ज अपने जब तक पूर्ण हो जाएं दायित्व मेरे जब तक निभा लू अपने सारे वचन जब तक खत्म कर लूं काम अपने सारे जब तक सम्पूर्ण  हो जाये कर्तव्य मेरे जब तक खुद से सम्बंधित हर एक व्यक्ति का मुझ पर कोई आभार, कोई उधार, कोई ऋण बाकी न रहें। जब तक मेरी हर एक श्वास मुक्त न हो जब तक आत्मा पर कोई बोझ न हो जब तक आंखों में तुम्हारे संग के अतिरिक्त और कोई स्वप्न  बचा न हो। अब और क्या कहूँ?  कैसे समझाऊँ? पर क्या कर सकते हो प्रतीक्षा अनन्त काल तक अम्बिका 'रेनू' सभी मेरी मौलिक रचनाएं हैं कृपया कॉपी न करें।

प्रेम-भाव एक रूप अनेक

 कोमल मन के भाव सभी प्रेम ही तो हैं प्रेम जो होता है अनेक से, बस रूप बदल जाते हैं। कभी प्रेम लगा लेता है चेहरा माँबाप का कभी भाई बहनों के रूप में बदल जाता है कभी शक्ल लेकर दोस्तों की, प्रेम जीवन मे बिखर जाता है। कुछ खिलोने, पेंसिल, रबर, कटर, किताबे, कुछ कपड़े, कुछ पुरानी थैली या सन्दूक जिनमे भरा होता है बचपन का खजाना, बतला देते हैं प्रेम का अलग ही सार। कभी अपनी कोई गैय्या, कभी कोई काला भूरा सा शेरू, या छोटी सी बिल्ली भी भर देती है जीवन मे प्रेम के कुछ और रूप। कभी कभी कोई फूलोंसे भरी टहनी,  पेड़पौधे सिखा जाते हैं प्रेम की नई परिभाषा केवल देना ही है जिनका आधार। जीवन मे प्रेम आता है फिर नये रूप में, जब प्रेम होता है किसी खास से, जो बना होता है केवल तुम्हारे लिए, भरकर अनेक रंग जीवन मे प्रेम बिखर बिखर जाता है चारों ओर। फिर रूप बदल लेता है प्रेम, जब आपके प्यार से साकार होता है एक नया आकार, मिलती है जब प्रेम को एक नई पहचान। सफर प्रेम का, प्रेम से ही शुरू होता है, प्रेम में ही सिमटता है। फिर क्यो बीच बीच मे जिंदगी के ये नफरतें चली आती हैं। फलतेफूलते प्रेम को देख, क्यो नफरत सुलग सी जाती ...