संदेश

जीवनदाई जल –अब तो बचाओं

चित्र
जीवनदाई जल – अब तो बचाओं   पानी - जीवन का आधार , पानी के कारण ही धरती पर जीवन संभव हुआ हैं यदि यह पानी न होता तो शायद   धरती पर जीवन भी ना होता. अमूल्य कितना   जिसके बिना जीवन की कल्पना भी नही की जा सकती, जल ही जीवन हैं बार बार सुनते हैं, मानते भी हैं पर समझना नही चाहते.   लोग जल संरक्षण   में नही बल्कि   धन या धातु संरक्षण (सोना, चांदी ,हीरे,मोती) में लगे हुए   हैं . क्या करेंगें   इन सबका, जब धरती पर पानी ही नही बचेगा. पानी नही तो जीवन नही और जीवन ही नही हो तो ये सब भी तो ब्यर्थ ही हुआ ना.   क्या कोई और विकल्प हैं जल का हमारे पास? नही ना, तो फिर क्यों नही जाग जाते अब भी.जिस देश में कई नदिया बहती हो उस देश का ये हाल हैं कि पीने को साफ़, स्वच्छ और शुद्ध पानी नसीब नही हैं.   धरती पर उपलब्ध पूरे पानी में से केवल 1% या फिर उससे भी थोडा कम का ही प्रयोग हम कर सकते हैं . कितनी नदिया, तालाब,पोखर हुआ करते थे पहले, पानी से लबालब भरे हुए. हमारे पूर्वज जिन्हें हम बड़े गर्व से ओल्ड जेनरेशन या पुरानी पीढ़ी के लोग कहते हैं हमसे कई गुना ज्यादा सम...

मेरा दादू पार्ट-1

चित्र
मेरा दादू भाग - 1 मेरा दादू- मेरा सबसे अच्छा दोस्त , मार्गदर्शक , आलोचक और मेरा सबसे बड़ा   कम्पटीटटर भी , जी हां   कम्पटीटटर भी वो ऐसे की अब मम्मी पापा किसे ज्यादा प्यार करते हैं ये वाला पन्गा तो हर घर   में हर भाई बहन के बीच जरूर होता हैं तो हो गया न कम्पटीटर. अब   ऐसे में मम्मी पापा आपको ही ज्यादा प्यार करे ये तो जरुरी   हैं   ही जरुरी ये भी हैं की ये कम्पटीटर भी मतलब   की आपका भाई भी केवल आपको ही सबसे ज्यादा प्यार करें और अगर नहीं   भी करता हो तो कहे कि सबसे ज्यादा प्यार तो मैं बस   तुझे    ही करता हूँ हा हाहा ! ये हैं मेरा बचपन ! मैं दो भाइयो की एकलौती   बहन हूँ , इकलौती बहन होना दो भाइयो के बीच में कभी कभी बड़ा फायदेमंद होता हैं और मैं तो एक साथ छोटी बहन भी थी तो बड़ी दीदी भी क्योकि मेरा एक भाई मुझसे छोटा हैं   पर आज बात करेंगें छोटी बहन के बारे में दीदी को आज विराम देते हैं बहुत कठिन जॉब हैं न दीदी होना भी तो , तो आज छोटी बहन को सामने लाते हैं. मैं अपने दादू से ढाई तीन साल छोटी हूँ पर उससे हमेशा ऐसे लड़ती हूँ जैसे ...

” मेरा बचपन मेरा दादू पार्ट-3 “

चित्र
हैलो दोस्तों आज मैं   फिर आपके सामने हाज़िर हूँ”  मेरा बचपन मेरा दादू पार्ट-3 “लेकर.   जैसा कि आपको पिछले भाग में मैंने बताया था   की अब हमारी तिकड़ी हो गई थी मेरा छोटा भाई मनु भी अब हमारे ग्रुप में आ गया था तो शैतानी थोड़ी सी बढ़ गई थी, वेसे ये थोड़ी सी, मुझे या मेरे दोनों भाइयो को ही लगती थी मम्मी पापा को तो हम मासूम हमेशा शैतान और दुष्ट ही लगते थे जिसमे बिलकुल भी सच्चाई नही थी.  हाँ तो मैं बता रही थी की तिकड़ी बन गई थी अपनी.और तिकड़ी के मेम्बेर्स थे बिन पैंदे के लौटे, कभी मैं दादू की साइड तो कभी दादू मनु की साइड तो कभी मनु से ही या दादू से ही आपस में पंगा. आपस में ही कभी दे दना दन तो कभी प्यार. सच्ची बहुत प्यारे दिन थे वो जब रुठते भी खुद ही थे और मानते भी खुद ही थे. एक दुसरे से लड़ना , पीटना, मानना, मुस्कराना और रात को सबका एक साथ बैठकर कहानी सुनना.  कहानी का किस्सा भी मजेदार था. रोज रात को मनु और मैं दादू के सामने बैठ जाते और वो कहानी सुनाता – एक था भगवा लाटा,,,,,,, अब ये भगवा लाटा एक ही दिन नही होता था बल्कि रोज होता था. रोज हमको यही कहानी सुनाता और फ...

भिटोली- मायके का आशीष

चित्र
भिटोली- मायके का आशीष   आज भिटोली आई हैं मेरी. उत्तराखंड में एक रिवाज़ हैं जिसमे चैत्र महीने में प्रत्येक परिवार अपनी शादीशुदा बेटी को पकवान, मिठाई, नए कपडे,   रुपये आदि देते हैं जिसे भिटोली कहा जाता हैं. जिनकी नयी नयी शादी हुई होती हैं उनकी पहली भिटोली चैत्र से पहले महीने फाल्गुन में ही दे दी जाती हैं. प्रत्येक शादीशुदा बेटी अपने माता-पिता या भाई बहन का इंतज़ार करती हैं कि कब उसके मायके वाले उससे मिलेंगें. इस महीने का उत्साह   उनमे देखते ही बनता हैं ये जानने की उत्सुकता थी की आखिर भिटोली   क्यों मनाया जाने लगा इसके पीछे क्या कारण था या इसके बारे में   कोई प्रचलित कहानी थी तो इस बारे में पता किया तब मेरे सामने एक कहानी आई. कहानी मेरे मामाजी ने मुझे बताई थी जब वो अपनी बहन को भिटोली देने आये थे. कहानी उनके अनुसार कुछ ऐसी   थी- पुराने समय में गोपीचंद नाम के एक राजा हुए. कई वर्ष राज करने के बाद वो सांसारिक जीवन से ऊब गये और उन्होंने संन्यास ले लिया. संन्यास लेने के बाद वो जगह जगह भिक्षा मांगकर अपना जीवन यापन करने लगे. कहा जाता हैं की जो संन्यास...

अनचाही ................................

समाचार   पढ़ रही थी तो एक खबर पर ध्यान रूक गया खबर थी की   बेटे की चाहत थी , बेटी पैदा हुई तो नाम रख दिया ' अनचाही '. गुस्सा भी आया और सोच पर तरस भी. इसी बात को मैं अपने   पति से साझा   करते हुए बिचार विमर्श   कर रही थी. एक बात जो उन्होंने कही - लोग कहते हैं कि   बेटे वंश आगे बढ़ाते हैं   ये सही नहीं हैं क्या राम का , रावण का या कौरवो का , पांडवो   का वंशज कोई हैं आज ? इतने शासक    हुए   हिंदुस्तान   में , एक के बाद एक अगली पीढ़ी सिहासन में बैठी   उनके वंश क्या अमिट रहे. एक समय ऐसा जरूर आता हैं जब सब नष्ट   हो जाता हैं कुछ नहीं बचता वंश भी नहीं. तो ये बात तो सिरे से ही गलत हैं. दूसरी बात जो उन्होंने कही कि परिवार और घर की स्त्री यदि चाहे तो कोई भी बेटी गर्भ में ही मारी नहीं जायेभी, कोई भी बेटी अनचाही न कहलाई जाये. सही   कहा उन्होंने.   स्त्री जब तक स्वयं ही नहीं समझेगी की संतान तो संतान हैं क्या बेटा और क्या बेटी ,   जीवन पथ पर दोनों ने ही आगे बढ़ना हैं कोई भी हमेशा आपके साथ ही रहेगा इसकी कोई गारं...