संदेश

तुम बनो शांत समंदर से

तुम बनो शांत समंदर से मैं तो बनूँगी अल्हड़ सी नदी जिसे सीमाओं में न बांधा जा सके जब वो अपने उफान पर आए तुम बनना बहुत समझदार से मैं तो बनूँगी कुछ कुछ चँचल बेवकूफ सी, जिसकी शैतानियों से तुम पार ही न पा सको तुम करते रहना प्लानिंग्स ढेर सारी क्या करना, कैसे करना मैं करूँगी मनमानियां अपनी, बिना आगे पीछे कुछ भी सोचे मैं बस एक बात चाहूंगी मेरी हर बेवकूफी, शरारत और गलती पर मेरे साथ रहना ताकि मैं सारा ठीकरा तुम्हारे सिर डालकर निश्चिंतता से अगली शैतानी कर पाऊँ

पुराने दिन और रिश्ते💜💜

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एक समय था जब लोग बहुत देर तक परिवार के साथ, मित्रों के साथ बैठते थे, बातें करते थे पर आज के समय मे लोगों के बीच संवाद/बातचीत या कंवर्सेशन बिल्कुल ही कम होती जा रही है। चलो कोई अकेले हैं तो फोन में व्यस्त होना समझ आता है पर परिस्थिति तब और भी गलत लगती है जब कोई साथ है या पूरे परिवार के बीच मे भी अगर कोई अपने फोन में ही व्यस्त है। सब साथ हों और सब ही अपने अपने फोन में बिजी हो तब बड़ी अजीब स्थिति हो जाती  है। कहाँ के सुख कहाँ के दुःख। पहले से शाम के चाय पानी के वक्त या रात के खाने के समय व बाद में सब साथ बैठते थे बातें होती थीं, एक दूसरे की परेशानियों को समझते थे, खुशियां बांटते थे पर अब इन सब को मन तरस जाता है। अपने सुख दुख बांटकर मन भी हल्का व खुश हो जाता था, लोग किस्से कहानियां, अपने अनुभव शेयर करते थे। शायद तभी इतना अकेलापन नही था और आज सब  डिजिटल भीड़ में तो हैं पर उनमें से कितने एक्चुअल प्रॉब्लम में आपके साथ, आपके पास होंगे कोई नही जानता।  आज हमारे पास फ्रेंड्स की लिस्ट मिलियन्स तक होती है पर जब आप कठिनाई में होंगे तो सामने कोई नही। जबकि पहले लोग आपको सुनते थे, लोग आपस म...

विश्वास

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 ★मृत्यु का भय? नही है. ★स्वयं से प्रेम? अथाह. ★ये विरोधाभाष नही? नही. ★क्यो? मृत्यु मेरी नही, शरीर की और यदि मृत्यु हुई तो प्रभु इच्छा से नया जन्म या मोक्ष  ★और स्वयं से प्रेम? प्रभु से प्रेम, प्रभु की प्रत्येक रचना से प्रेम, मैं स्वयं प्रभु रचित, तो स्वयं से प्रेम क्यो न हो ★पुनः नव जीवन?? प्रभु रचित संसार मे मेरे कर्म, कर्म बंधन, कर्तव्य अपूर्ण उन्हें पूर्ण करने का एक ओर अवसर ★मोक्ष?  सीधे प्रभु मिलन, ब्रह्मांड में विलीन और घुलित ★पुनः जीवन मे दुःख? शायद मैं अधिक प्रिय प्रभु को, वो चाहते मैं उन्हें कभी भी, किसी भी परिस्थिति में न बिसराऊ  ★प्रभु पर विश्वास का कारण? क्योकि वो हैं.  सदा से, सृष्टि से पहले से भी, बाद भी, जब कुछ नही था तब भी, जब बहुत कुछ है तब भी, विज्ञान में भी और ज्ञान में भी, अणु में भी, परमाणु में भी शून्य में भी, अनन्त में भी🙏🙏🙏 (विचार चलते रहते मन मे, बस यूँही उतार लिए शब्दों में)  रेनू'अम्बिका'

ईश्वरीय कृपा

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 सुबह की उजली लालिमा ली हुई सूर्य की किरणें, जब बिखरती है विशाल नीले आसमानी से पटल में, जब चहचहाती हैं चिड़ियां मीठी सी आवाज में, जब मंद मंद सी बयार बहती है छूकर पेड़ो की पत्तियों को, जब सूरज और चंदा होते हैं कुछ देर को एक साथ,आसमान में एक दूसरे के आमने सामने  और जब रात मुस्करा कर लेती है विदा और करती है स्वागत सवेरे का,  सुबह का हर एक वो पल मुझे यकीन दिलाता है ईश्वर की असीम शक्ति, कृपा और प्रेम का........ जो अनवरत है लगातार है...... अम्बिका 'रेनू'

तुम्हारा अधिकार

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  सुनो कभी अपना अधिकार भी मान लेना मुझ पर जब मैं कहूँ की तुम मुझ में ही बसते हो कहीं. ये अधिकार जिसे तुम्हे दिया है मैंने स्वयं, अपने आप के उस हिस्से से जो है केवल मेरा ये वो हिस्सा है मेरा, जो दबा नही है किसी भी सामाजिक रीति ओर रिवाजों, कर्तव्यों, फर्जों की चारदीवारी तले. मेरा नितांत स्वतंत्र हिस्सा जहाँ मैं मुक्त हूँ. जहाँ मुझे समाज की, धर्म की, संस्कारों की कोई भी बेड़िया जकड़ नही सकतीं। तुम्हें क्यों सौंप दूँ वो हिस्सा जो बंटा हुआ है, कई हिस्सों में, कुछ कुछ, थोड़ा थोड़ा सबकेलिए तुम्हारे लिए है, केवल वह हिस्सा जो बस मेरा है। मैं होती हूँ भिन्न भिन्न समाज मे भिन्न भिन्न रूपों में हँसती, मुस्कराती, गाती, गुनगुनाती, खिलखिलाती और भी सारे, कई अन्य भावों का साथ कभी इच्छा से कभी अनिच्छा से पर.... तुम्हारे प्रेम में मैं होती हूँ बस स्वयं सी खुद में मगन, प्रसन्न सी, थोड़ी कसक व बैचैन सी. केवल ओर केवल स्वयं की इच्छा से तो तुम भी मानना मुझ पर, स्वयं का अधिकार प्रेम का अधिकार.... संपूर्णता का अधिकार... अम्बिका 'रेनू'

साथ चाहिए तुम्हारा

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 कान्हा साथ चाहिए मुझे, तुम्हारा जब मैं दिल,दिमाग से लड़ते लड़ते थक जाऊँ, तब तुम पास आ जाओ मेरे कंधे पर सिर रखकर कुछ पल सुकून और शान्ति मिल जाये मुझे। अपने भीतर के शोर को कम करने के लिए जाल सा जो बुन लिया है मैंने कभी कभी दरक जाते हैं  उसके भी कुछ फंदे, जहाँ से झाँकने लगती है पीड़ा अथाह सी कुछ बूंद बूंद सी गिरती है ह्रदय पर किन किन भावों और भावनाओं की दर्द ? मोह? प्रेम? क्रोध? बिछोह? बेबसी या लाचारी पता नही पर सूखे ही रहते हैं नयन  बस मन भीग भीग सा जाता है तब कान्हा साथ चाहिए होता है तुम्हारा तुम ही कहो,  कुछ मार्ग भी रखे हैं तुम तक पहुचने के अपनी पीड़ा और प्रेम तुम तक पहुचाने के या प्रेम करने के बाद भी.... तुम तक नही पहुचेंगे मन के उद्गार कोई अम्बिका 'रेनू'

प्रभ भरोसे

  कुछ भी नही प्रभु मैं, बस आपके चरणों की धूल हूँ मैं संवर रही हूँ, निखर रही हूँ जब से शरण मे आई हूँ अब चिंता कुछ है नही मुझे, तुम हो न सब देखने को संभालने को, रास्ता दिखाने को, नैय्या पार लगाने को तो क्यो चिंता करूँ मैं व्यर्थ में ही क्यों मन को भरमाऊं मैं जो भी है तुम देख रहे हो चित्त को काहे अधीर करूँ मैं

तुम्हारे साथ, एक चाय मिट्टी के कुल्हड़ में

  सुनो....... तुम्हारे साथ ठंडे से, भीगे मौसम में, मिट्टी केकुल्हड़ में गरम सी चाय पीनी है। हाथों से कुल्हड़ को पकड़े हुए, चाय की चुस्कियों के बीच बीच में, देखना है तुम्हे जी भरके और घूँट घूँट चाय की तरह रखना है तुम्हें उस हर एक पल,नजरों में बसाके जिस तरह  चाय की हर घूँट में आंखे बंद हो जाती है, आनन्द और शांति से उसी तरह साथ तुम्हारे, मिट्टी के कुल्हड़ को हाथों में थामे हुए महसूस करूंगी मैं वही शांति, आनन्द और प्रेम को।। ठंडे से मौसम में, भाँप उड़ाती चाय को काँपती सी उंगलियों से पकड़ कर, तुमसे करनी हैं दुनिया जहान की बातें कुछ अपनी, कुछ तुम्हारी, कुछ हमारी और कुछ तकलीफों, परेशानियों की बातें। जिस तरह उड़ जाती है भाँप, मिट्टी के कुल्हड़ की चाय से उसी तरह शायद मिट जाएंगी तकलीफें, परेशानियां, जिम्मेदारियां और बेचैनियाँ इस दिल, दिमाग और इस मिट्टी से बने शरीर से जब मिट्टी का कुल्हड़ रिक्त हो जाएगा चाय से कुछ निशान तो फिर भी रहेंगे ना चाय के, उसकी मिठास के,  उसकी सुगन्ध के, फिर मैं उठ जाऊंगी, तुम भी उठ जाओगे चलेंगे फिर से अपने गंतव्य को, बढेंगे फिर से अपने...

कभी स्त्री कभी पुरुष

  कईबार सुना था मैंने मर्द सी स्त्री या पुरुष स्त्री सा, बहुत समय पश्चात,समंझ आया एक ही मनुष्य में छुपे होते हैं प्रकृति के दोनों रूप...... पुरुष भी स्त्री भी बस जिसको मिली जैसी परिस्थिति वही अपना रूप दिखा गया स्त्री को बन जाना पड़ा कई बार पुरुष और कभी परिस्थितियों ने बना दिया पुरुष को स्त्री दोनों ही रूपों में दोनों पूर्ण रहे चाहे सुकोमल सा पुरुष या भीम सी बलवान स्त्री कभी मजबूत और उदंड बन जाना पड़ा स्त्री को कभी दया और प्रेम का सागर उमड़ आया पुरुष में। कुछ तो अज्ञानी थी मैं अर्धनरनारीश्वर का मतलब जानने में समय लगा वही समझा जो बताया गया स्वयं समझने की कोशिश नही की क्योकि बरसों से बस लकीर के फकीर रहे हैं हम बस जब लकीर के साथ चलना छोड़ा  बहुत कुछ छुपा हुआ जो था, अज्ञात वो सामने आ गया बनकर ज्ञात एक ही रूप शिव और शक्ति पूरक एक दूसरे के हैं, समाहित एक दूसरे में अब जानती हूं ......... एक ही इंसान में होते हैं दोनों, कभी स्त्री कभी पुरुष

प्रतीक्षा लम्बी होगी तुम्हारी

 प्रतीक्षा लम्बी होगी तुम्हारी तुमने प्रेम चुन लिया ईश्वर को चुना होता तो शायद मिल भी जाते कुछ पहले पर तुमने प्रेम चुन लिया प्रेम, जिसे पाने को, महसूस करने को श्री हरि को भी लेना पड़ा जन्म, करनी पड़ी उन्हें भी प्रतीक्षा आना पड़ा उन्हें द्वापर में फिर से साथ पाने के लिए राधा का। केवल साथ पाने के लिए जब लेना पड़ा जन्म हरि को भी कृष्ण रूप में तुम तो फिर भी मनुष्य हो सोचो कितने जन्म लगेंगे युगों तक की प्रतीक्षा जब कृष्ण की ही रही सोचो, तुम्हारी प्रतीक्षा क्या होगी और केवल श्री हरि ही क्यों प्रेम में विकल और बावरे तो महादेव भी हुए प्रतीक्षा तो उनकी भी लम्बी रही कई युगों की साधना रही कई युगों का ध्यान रहा सती जो गईं वो युगों बाद ही लौटीं सती को जाने में और पार्वती के आने में सोचो कितनी प्रतीक्षा रही अनवरत, लगातार और लगातार तभी तो कहा प्रतीक्षा लम्बी होगी तुम्हारी तुमने प्रेम चुन लिया जहाँ ईश्वर भी आधीन प्रेम के उनके भाग में भी प्रतीक्षा आई तुम तो सूक्ष्म से प्राण रूप तुम्हारी प्रतीक्षा कितनी लम्बी होगी चुन लिया होता यदि ईश्वर को मिल जाते वो तुमको कुछ पह...

मैं, मैं न रहूं बस तुम बन जाऊं

प्रेम जो कहते हो या प्रेम जो बुनते हो क्या अपने शब्दों में तुमको बतलाऊँ कौन से भाव, कौन सी प्रेरणा तुमको मैं सब जतलाऊँ             तो सुनो प्रिय.......... तुम बन जाओ मोरपंख से मैं मोरपंख के रंग बन जाऊं। तुम कान्हा की मुरली से मैं राग और धुन बन जाऊं।। तुम लो प्रेम में जो जो रूप मैं हर एक रूप की छाया बन जाऊं। प्राण बनो तुम जब भी मैं तुम्हारी काया बन जाऊं।। प्रेम वशीभूत हो जब भी मुझे पुकारो मैं कंठ से निकली आवाज बन जाऊं। जब भी देखो प्रेम से मुझे तुम नेत्रो में समाई पुतली बन जाऊं।। आप, आप न रहे मेरा मैं बस तुम, बस तुम बन जाऊं। कोई कुछ शेष न रहे मेरा, कुछ मुझमे मैं तुम्हारी श्वाश, तुम्हारी धड़कन बन जाऊं।। प्रेम की पवित्रता हो इतनी मैं ओस की बूंद सी बन जाऊं। और गहराई हो इतनी प्रेम में दरिया, ताल, सागर हो जाऊं।। कविता की 2 पंक्तियां मेरी फैवरेट लेखिका  अंकु ट्ह ठाकुर कलम से निकली हैं, पूरी कविता लिखी पर प्रेरणा ओंकी लाइन थी जो मैं भूल ही नही पाई थी। thank you aanku💜

प्रेम...

  कुछ प्रेम....... कोई शोर नही कोई साथ नही हाथ पकड़ना नही लेकिन फिर भी... होते हैं खामोशी से, एक दूसरे के भीतर तक न कोई दिखावा न कोई दिलासा न साथ चलने की अभिलाषा न कोई वादा या वचन           फिर भी............ चल पड़ते हैं कदम खुद ब खुद       साथ निभाने को जब भी लगता है कि प्रेम को तुम्हारे,     चाहिए होगा साथ तुम्हारा तुम्हारा प्रेम मौन रहेगा माँगेगा नही साथ तुमसे और न कोई निवेदन बस चाहेंगे कि तुम रहो साथ और तुम.........          तुम रहोगे साथ, हमेशा हमेशा आह!!! कुछ प्रेम..................

कर सकते हो प्रतीक्षा

 कर सकते हो प्रतीक्षा तब तक....... जब तक पूरे कर लूं फर्ज अपने जब तक पूर्ण हो जाएं दायित्व मेरे जब तक निभा लू अपने सारे वचन जब तक खत्म कर लूं काम अपने सारे जब तक सम्पूर्ण  हो जाये कर्तव्य मेरे जब तक खुद से सम्बंधित हर एक व्यक्ति का मुझ पर कोई आभार, कोई उधार, कोई ऋण बाकी न रहें। जब तक मेरी हर एक श्वास मुक्त न हो जब तक आत्मा पर कोई बोझ न हो जब तक आंखों में तुम्हारे संग के अतिरिक्त और कोई स्वप्न  बचा न हो। अब और क्या कहूँ?  कैसे समझाऊँ? पर क्या कर सकते हो प्रतीक्षा अनन्त काल तक अम्बिका 'रेनू' सभी मेरी मौलिक रचनाएं हैं कृपया कॉपी न करें।

प्रेम-भाव एक रूप अनेक

 कोमल मन के भाव सभी प्रेम ही तो हैं प्रेम जो होता है अनेक से, बस रूप बदल जाते हैं। कभी प्रेम लगा लेता है चेहरा माँबाप का कभी भाई बहनों के रूप में बदल जाता है कभी शक्ल लेकर दोस्तों की, प्रेम जीवन मे बिखर जाता है। कुछ खिलोने, पेंसिल, रबर, कटर, किताबे, कुछ कपड़े, कुछ पुरानी थैली या सन्दूक जिनमे भरा होता है बचपन का खजाना, बतला देते हैं प्रेम का अलग ही सार। कभी अपनी कोई गैय्या, कभी कोई काला भूरा सा शेरू, या छोटी सी बिल्ली भी भर देती है जीवन मे प्रेम के कुछ और रूप। कभी कभी कोई फूलोंसे भरी टहनी,  पेड़पौधे सिखा जाते हैं प्रेम की नई परिभाषा केवल देना ही है जिनका आधार। जीवन मे प्रेम आता है फिर नये रूप में, जब प्रेम होता है किसी खास से, जो बना होता है केवल तुम्हारे लिए, भरकर अनेक रंग जीवन मे प्रेम बिखर बिखर जाता है चारों ओर। फिर रूप बदल लेता है प्रेम, जब आपके प्यार से साकार होता है एक नया आकार, मिलती है जब प्रेम को एक नई पहचान। सफर प्रेम का, प्रेम से ही शुरू होता है, प्रेम में ही सिमटता है। फिर क्यो बीच बीच मे जिंदगी के ये नफरतें चली आती हैं। फलतेफूलते प्रेम को देख, क्यो नफरत सुलग सी जाती ...

तुम मेरा जवाब बन जाओ

  जो मेरी खामोशी को सुन पाओ, जो मेरी बैचेनियों का जवाब बन जाओ। जो मुस्कराते होंठो, खिलखिलाती हँसी में छुपी उदासी भाँप जाओ और जो शरारती, चंचल आंखों में छुपी नमी और आँसू की बूंदे तुम्हे दिख जाएं , जो समझ जाओ कि जरूरी हो तुम मेरे लिए। जो समझ जाओ कि ढेर सारी बातें करनी है तुमसे। कुछ अपनी, कुछ मेरे सपनों की, कुछ मेरी भावनाएं और कुछ यूँही हाथ पकड़ कर साथ घूमते हुए बातें। मैं बताऊँ तुम्हे कि हाँ डर भी लगता है बिना तुम्हारे अकेले रहने में, भले ही बनी रहूं मैं मजबूत पहाड़ सी। मैं बताऊँ तुम्हें की मुझे खिलना है फूल सा तुम्हारे साथ, मुझे मुरझाया हुआ सिकुड़ा सा फूल नही बनना। मुझे निखरना है अभी भी बहुत, तेरे साथ जीवन मे आगे बढ़ते हुए कि अभी तो कई चीजें सीखनी बाकी हैं मुझे। तुम समझ जाओ जब कहूँ कि सब बढ़िया है, मैं देख लुंगी  तो दिल चाहता है कि तुम साथ मे रहो, बड़ी से बड़ी परेशानी से मुझे फर्क नही पड़ता, मैं झेल लुंगी। मैं मजबूत बहुत हूँ स्वयं में ही, हर चीज अच्छी कर सकती हूँ, बस साथ तुम्हारा, प्यार तुम्हारा, विश्वास तुम्हारा, मेरे खुद पर यकीन को और बढ़ा देता है कुछ भी हो सामने प्रश्न मेरे...

प्रेम -समय के साथ बदलते रूप

                                          प्रथम भाग प्रेम जिसमे टिका संसार सारा, जो आधार इस सृष्टि का ।                   आपका प्रेम, आपको किस दिशा में ले जा रहा है इसका मनन करना बहुत जरूरी है। As a human  आप उन्नति कर रहे हो या अवनति ये जानना जरूरी है। अगर किसी के आपके लाइफ में आने से आप positive person बन रहे हो, आपकी आध्यात्मिक उन्नति हो रही है, आप अपने फर्ज व कर्तब्यों को समंझ रहे हो, सामाजिक व आर्थिक रूप से आगे बढ़ रहे हो, जो आपको सही और गलत की समंझ दे रहा हो, जो आपको आपके अच्छे और विकास के लिए प्रेरित कर रहा हो वही व्यक्ति आपके लायक है नही तो नही। और जो ऐसा न हो, ऐसे से कैसे प्यार, क्यो प्यार. ऐसे इंसान से दूर रहना ही भला है।  केवल शारीरिक आकर्षण के आधार पर जो प्रेम होता है वह ज्यादा समय रहता नही, आपका आकर्षण खत्म, रिश्ता खत्म. क्या लाभ ऐसे सम्बन्धो का?? जहाँ आधार प्रेम नही केवल बाहरी सौंदर्य, जरूरत,  या लाभ हानि ह...

मेरे देश के प्रहरी

           नभ जल थल के वीर योद्धा, वीरता से अडिग खड़े, युद्ध की विनाश लीला में, जो मृत्यु से भी किंचित न डरें। भारत माँ के सच्चे सपूत, वो माँ के लाडले, भूल कर सब कुछ अपना पराया, जो रणभूमि की और चले। कुछ खैर नही दुश्मन की, स्वयम को बचा ले अब हर एक को देते मृत्यु आलिंगन मंजिलों से पहले रणबाँकुरे रुकते नहीं नमन है उनको ह्रदय से जो युद्धभूमि में शेर से दहाड़ रहे     अम्बिका 'रेनू'

छोटी छोटी खुशियां

छोटी छोटी खुशियां जो मिल जाती हैं यू ही, इंतजार नही करना पड़ता जिनका, बनाकर कोई टाइम टेबल। जो मिल जाती है कभी रास्ते पर चलते किसी दोस्त को देखकर, जो मिल जाती है कभी छोटे बच्चों को खेलते कूदते और नाचते देख कर, उनकी हँसी, ठिठोली और शरारतों में कभी मिल जाती है यूं भी कि इन्तजार में है कोई तुम्हारे, और कभी मिल जाती है ये खुशी, थाली में देखकर अपना पंसदीदा भोजन। ये छोटी खुशियां जो निर्भर नही होती किसी बड़े कारण, खूब प्लानिंग और बहुत समय पर ये छोटी छोटी खुशियां जैसे चांदी से सीक्के जो मिल जाते हैं हमें हर रोज कई कई बार बिना यत्न के, बिना प्रयत्न के, बिना आशा के जो ले आते हैं चेहरे पर अनायास मुस्कान इन खुशियों की बदौलत मुस्कराते हैं हम कई कई बार सोचो तो जरा कितनी अनमोल हैं ये छोटी छोटीसी खुशियां

संतुष्टि

कभी कभी आप कुछ देखते हो, महसूस करते हो, सोचते हो, मनन करते हो और फिर आप ये समझते हो कि जिंदगी हमेशा आपको कुछ न कुछ सिखाती ही रहती है, बस जरूरत उन सब से सीखने भर की होती है। आज सुबह से ही ठंड ज्यादा थी या शायद मुझे लग रही थी क्योंकि सर्दी जुखाम फिर से हो गया था मुझे। ये कमजोर इम्यून सिस्टम भी ना आये दिन की मुसीबत खड़ी कर देता है। हा तो ठंड ज्यादा थी तो सुबह 11 बजे तक सीधे दाल, चावल, सब्जी बनाकर खाना ही खा लिया था, नाश्ता स्किप कर लिया था कि इतनी बार ठंड में किचन में काम न करना पड़े। खाना खाकर सिंक में बर्तन ठुसाते हुए उनको पानी से भरकर मैं बाहर धूप में बालकनी में  रखी कुर्सी पर बैठ गई। गुनगुनी सी धूप में कुछ देर मोबाइल चलाती रही फिर बोर होने लगी तो मोबाइल साइड में रख दिया और यूँही आस पास देखने लगी। चारो और बिल्डिंग्स, व्यस्त लोग, भागते, दौड़ते लोग, लोगों के घरों की छतें, कही कही छतों पर बनाये गए खूबसूरत से टेरेस गार्डन। दूर दूर तक नजर डालती रही और फिर नजर पड़ी अपनी बिल्डिंग के जस्ट बगल में बन रही एक नई बिल्डिंग पर। आजकल तो दिल्ली में कही जगह ही नही बची, सब जगह 4 या 5 मंजिला बिल्डिंग्स ह...

इम्तिहान जिंदगी के

बहुत अजीब है जिंदगी, इम्तिहान बहुत बार, बार बार लेती है। देखती है आपको कि अब कितनी हिम्मत बची है, कि देखु अब भी लड़ पाते हो कि नही आने वाली कठिनाइयों से।